📘 विषय-सूची (Table of Contents)
प्रस्तावना (Preface)
- भूमिका: ‘डिग्री’ की अर्थी और ‘सिस्टम’ का जनाजा।
- लेखक की बात: युवा का कंफ्यूजन और सरकार का फ्यूजन।
भाग 1: युवा, उम्मीदें और बेरोजगारी का दलदल
- अध्याय 1: सुबह की चाय और ताने की मलाई
- घर के ‘लाडले’ से ‘नकारा’ बनने तक का सफर।
- अध्याय 2: रील्स (Reels) की दुनिया, हकीकत का शून्य
- इंस्टाग्राम पर रॉकस्टार, एंप्लॉयमेंट एक्सचेंज में कतार।
- अध्याय 3: फॉर्म की माया, लीक का साया
- सालों की तैयारी, दो घंटे का इम्तिहान और दस मिनट में पेपर लीक।
- अध्याय 4: व्यंग्य काव्य: “डिग्री हाथ में, कटोरा साथ में”
- पढ़े-लिखे बेरोजगारों के दर्द पर एक तीखी कविता।
भाग 2: सरकार, सिस्टम और रिश्वत का शिष्टाचार
- अध्याय 5: सरकारी दफ्तर: जहां फाइलें रेंगती हैं, नोट उड़ते हैं
- टेबल नंबर 4 से कमरा नंबर 420 तक का चक्रव्यूह।
- अध्याय 6: बाबू का ‘चाय-पानी’ और नेता का ‘विकास’
- रिश्वत का नया नाम: ‘सुविधा शुल्क’ और ‘सेवा भाव’।
- अध्याय 7: घोषणापत्रों का कब्रिस्तान
- चुनाव के वादे बनाम सत्ता की मलाई।
- अध्याय 8: व्यंग्य काव्य: “कुर्सी का कीड़ा और जनता का पीड़ा”
- भ्रष्ट राजनेताओं और अफसरों पर सीधा प्रहार।
भाग 3: जब टकराए ‘डिग्री’ और ‘रिश्वत’ (महा-संग्राम)
- अध्याय 9: एक ईमानदार बाप की रुकी हुई पेंशन
- जब सिस्टम एक बूढ़े लाचार पिता और कंफ्यूज्ड बेटे की परीक्षा लेता है।
- अध्याय 10: ‘गांधी’ की ताकत बनाम युवा का आत्मसम्मान
- बिना नोट के फाइल आगे बढ़ाने का पहला और आखिरी नाकाम प्रयास।
- अध्याय 11: दफ्तरों के चक्कर और बदलता चश्मदीद
- कैसे एक सीधा-साधा युवा सिस्टम की जलेबी में फंसकर चालाक बनता है।
भाग 4: कंफ्यूजन से क्रांति की ओर (The Climax)
- अध्याय 12: सोशल मीडिया का ब्रह्मास्त्र
- जब युवा रिश्वतखोर बाबू का वीडियो लाइव स्ट्रीम कर देता है।
- अध्याय 13: कुर्सी डगमगाई, तो देशभक्ति याद आई
- कार्रवाई का नाटक, सस्पेंशन का खेल और अंदरूनी सेटिंग।
- अध्याय 14: व्यंग्य काव्य: “अब जाग उठा है युवा आज का”
- भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का काव्यात्मक आह्वान।
उपसंहार (Conclusion)
- अध्याय 15: नया सवेरा या सिर्फ एक और इलेक्शन?
- क्या सिस्टम सचमुच बदला या सिर्फ चेहरे बदले? युवा के लिए एक कड़वा मगर जरूरी सबक।
प्रस्तावना (Preface)
भूमिका: ‘डिग्री’ की अर्थी और ‘सिस्टम’ का जनाजा
आज का दौर वह नहीं है जहाँ इंसान पैदा होता है, बड़ा होता है, पढ़ता है और सम्मान से कमाता है। आज का दौर वह है जहाँ एक युवा पैदा होता है, माता-पिता की उम्मीदों का बोझ उठाता है, भारी-भरकम ब्याज पर एजुकेशन लोन लेता है, डिग्रियों की फसल काटता है और फिर उन डिग्रियों को सूटकेस में बंद करके सरकारी दफ्तरों के बाहर ‘सर्कस का भूखा शेर’ बनकर खड़ा हो जाता है।
जब एक छात्र सालों की तपस्या के बाद कॉलेज से निकलता है, तो उसके काले गाउन और हाथ में लिपटे उस सफेद गोल कागज (डिग्री) को देखकर पूरी दुनिया को लगता है कि उसने कोई किला फतह कर लिया है। लेकिन हकीकत के तपते हुए मैदान में पैर रखते ही उसे अहसास होता है कि वह डिग्री और कुछ नहीं, बस एक चमकीला कफ़न है—उसकी जवानी की रातों की नींद का, उसके बुनते हुए सपनों का और उसके बूढ़े माता-पिता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई का। यह ‘डिग्री की अर्थी’ है, जिसे वह चौबीस-पच्चीस साल का नौजवान अपने ही मजबूत कंधों पर ढो रहा है। वह देश के हर उस शहर, हर उस गली और हर उस नुक्कड़ पर जाता है जहाँ ‘वेकेंसी’ का छोटा सा बोर्ड लगा हो। लेकिन हर मोड़ पर उसे मिलता है एक नया ताला, एक नई तारीख, या फिर परीक्षा से ठीक दस मिनट पहले ‘लीक’ हो चुका प्रश्नपत्र।
और इस अर्थी को कंधा देने के लिए, इसके सामने सीना ताने खड़ा है हमारा सर्वशक्तिमान ‘सिस्टम’। यह सिस्टम कोई अमूर्त या अदृश्य चीज़ नहीं है; यह हाड़-मांस के उन बाबुओं, बड़े अफसरों और सफेदपोश नेताओं से बना है जिनकी रीढ़ की हड्डी सिर्फ और सिर्फ गुलाबी नोटों की गड्डी देखकर ही लचीली होती है। जब एक होनहार, गोल्ड मेडलिस्ट युवा अपनी साफ-सुथरी फाइल लेकर इस सिस्टम के जादुई दरवाज़े पर दस्तक देता है, तो उसे पहली बार यह कड़वा सच समझ आता है कि देश का कानून, संविधान और नीतियाँ चाहे जो कहें, दफ्तरों की दीवारों के भीतर अपना एक अलग ‘सनातन धर्म’ चलता है, और उस धर्म का इकलौता नाम है—’घूसखोरी’!
जहाँ योग्यता को मेज के नीचे घुटने टेकने पड़ें, जहाँ प्रतिभा को दलालों के तलवे चाटने पड़ें और जहाँ चाटुकारिता करने वाले को मंच पर मेडल थमाया जाए, समझ लीजिए उसी क्षण इस देश में ‘सिस्टम का जनाजा’ बड़ी धूमधाम से निकल चुका है। इस जनाजे में शहनाइयाँ और नगाड़े वे हुक्मरान बजाते हैं जो हर पाँच साल में ‘करोड़ों रोजगार’ का चमकीला झुनझुना लेकर जनता के बीच आते हैं और मरघट की इस भयानक शांति के ऊपर अपनी सत्ता का आलीशान महल खड़ा करते हैं। यह किताब उसी अर्थी और उसी जनाजे के बीच फंसे आम भारतीय युवा की मूक चीख और उस चीख पर अट्टहास करते भ्रष्ट तंत्र का एक जीवंत दस्तावेज़ है।
लेखक की बात:
युवा का कंफ्यूजन और सरकार का फ्यूजन
प्रिय पाठक,
जब आप इस किताब के पन्नों को पलटना शुरू करेंगे, तो मैं पहले ही साफ कर दूँ कि यह कोई काल्पनिक परियों की कहानी नहीं है। न ही यह किसी ऐसे फिल्मी नायक की कथा है जो क्लाइमेक्स में उड़कर आएगा और विलेन को लात मारकर पूरे देश को एक सेकंड में ठीक कर देगा। यह कहानी आपके पड़ोस के उस उदास लड़के की है, लाइब्रेरी के कोने में बैठकर सिर पकड़े उस लड़की की है, या शायद खुद आपकी अपनी है, जो सुबह उठकर सबसे पहले दो ही चीज़ें देखता है—अपने मोबाइल स्क्रीन पर नई सरकारी भर्ती का नोटिफिकेशन और यूट्यूब पर ‘हाउ टू कंट्रोल डिप्रेशन एंड एंग्जायटी’ (अवसाद और तनाव को कैसे रोकें) का वीडियो।
आज का युवा एक अजीब और अंतहीन कशमकश के चौराहे पर खड़ा है। उसका कंफ्यूजन इतना गहरा है कि उसे समझ ही नहीं आता कि वह इस जीवन के साथ करे तो क्या करे:
- वह दिन-रात एक करके पढ़ाई करे—तो परीक्षा का पेपर सोशल मीडिया पर पहले ही बिक जाता है।
- वह तंग आकर खुद का कोई छोटा-मोटा बिजनेस (Startup) शुरू करना चाहे—तो सरकारी एनओसी (NOC), लाइसेंस, टैक्स की फाइलें और चपरासी से लेकर बड़े साहब तक के ‘हफ्ते’ उसे कच्चा चबा जाते हैं।
- वह अपने हक के लिए सड़क पर शांति से धरने पर बैठे—तो पुलिस की लाठियाँ और पानी की बौछारें उसका ‘स्वागत’ करती हैं।
- और अगर वह हार मानकर घर के कोने में बैठ जाए—तो समाज, रिश्तेदार और परिवार के ताने उसका मानसिक कत्ल करने के लिए तैयार रहते हैं।
इसी त्रिशंकु जैसी स्थिति को मैंने कहा है—युवा का कंफ्यूजन। आज का नौजवान इंस्टाग्राम की चकाचौंध वाली, गाड़ियों और पैसों वाली ‘नकली दुनिया’ और अपनी खाली जेब तथा फटी हुई चप्पल वाली ‘असली दुनिया’ के बीच पेंडुलम की तरह चौबीसों घंटे डोल रहा है। उसे समझ नहीं आ रहा कि देश सचमुच पाँच ट्रिलियन की इकॉनमी बन रहा है या सिर्फ उसका ब्लड प्रेशर और डिप्रेशन ट्रिलियन के पार जा रहा है!
अब आते हैं इस सिक्के के दूसरे पहलू पर, जिसे मैंने नाम दिया है—सरकार का फ्यूजन। हमारी आधुनिक सरकारों के पास जनता की हर बुनियादी समस्या का एक बड़ा ही जादुई ‘फ्यूजन’ (मिक्सचर) फॉर्मूला तैयार रहता है। वे राष्ट्रवाद, धर्म, भव्य आयोजनों, चुनावी मुफ्त की रेवड़ियों और ‘डिजिटल इंडिया’ के नारों को मिक्सी में डालकर ऐसा शरबत तैयार करती हैं कि मुख्य मुद्दा—यानी ‘सच्चा रोजगार’, ‘सस्ती शिक्षा’ और ‘ईमानदार व्यवस्था’—उस शरबत के नीचे कहीं दबकर दम तोड़ देता है।
जब देश का पढ़ा-लिखा युवा हाथ फैलाकर नौकरी मांगता है, तो मंच पर खड़े होकर नेताजी उसे ‘पकोड़े तलने’ और ‘आत्मनिर्भर’ होने का दिव्य ज्ञान देते हैं। जब वह दफ्तरों में फैली नग्न घूसखोरी की शिकायत करता है, तो उसे ‘सिस्टम के डिजिटलाइजेशन और सुधारीकरण की लंबी प्रक्रिया’ का बोरिंग भाषण थमाकर वापस भेज दिया जाता है। यह फ्यूजन इतना तगड़ा और भ्रमित करने वाला है कि आम आदमी कभी समझ ही नहीं पाता कि देश का विकास हो रहा है या सिर्फ उसकी जेब का विनाश हो रहा है।
एक लेखक के तौर पर, मेरा उद्देश्य यहाँ किसी खास राजनीतिक दल का झंडा उठाना या गिराना नहीं है। मेरा सीधा प्रहार उस ‘कुर्सी-संस्कृति’ और ‘ब्यूरोक्रेसी’ पर है जो आजादी के इतने सालों बाद भी युवाओं के भविष्य को दीमक की तरह चाट रही है। जब तक इस देश में मेज के नीचे से सरकने वाला ‘गुलाबी या हरा नोट’ मेज के ऊपर सम्मान से बैठी ‘डिग्री’ और ‘प्रतिभा’ पर भारी रहेगा, तब तक युवाओं का यह कंफ्यूजन और सरकारों का यह फ्यूजन इसी तरह थियेटर के शो की तरह चलता रहेगा।
आइए, इस किताब के माध्यम से हम इस कड़वी, बदबूदार हकीकत को हँसते-हँसते और रोते-रोते समझने की कोशिश करें। क्योंकि जब व्यवस्था इतनी ढीठ और बहरी हो जाए कि उसे आम इंसान के आँसुओं और सिसकियों से फर्क पड़ना बंद हो जाए, तो उस व्यवस्था के अहंकार के गुब्बारे को फोड़ने के लिए ‘व्यंग्य और कविता के तीखे तीरों’ से हमला करना ही समाज का आखिरी और सबसे कारगर रास्ता बच जाता है।
— आपका अपना लेखक : चंदन सिंह चौहान
भाग 1: युवा, उम्मीदें और बेरोजगारी का दलदल
अध्याय 1: सुबह की चाय और ताने की मलाई
घर के ‘लाडले’ से ‘नकारा’ बनने तक का सफर
सुबह के ठीक सात बजे थे। अलार्म की चीखने जैसी आवाज ने चंदर की आँखों की बची-खुची नींद को भी बेरहमी से कत्ल कर दिया। चंदर ने तकिए के नीचे से अपना पुराना, चटका हुआ स्क्रीन वाला मोबाइल निकाला। आदत के मुताबिक, उसने कोई काम का मैसेज नहीं, बल्कि सबसे पहले इंस्टाग्राम खोला। स्क्रीन पर एक मोटिवेशनल स्पीकर चिल्ला रहा था—“जो सुबह पांच बजे नहीं उठते, उनका जीवन व्यर्थ है! एटीट्यूड बदलो, दुनिया बदलो!”
चंदर ने एक ठंडी सांस ली, स्पीकर का मुंह म्यूट किया और बुदबुदाया, “भाई, पहले मेरा करियर बदल दे, दुनिया मैं खुद बदल लूंगा।”
चंदर, जिसकी उम्र अब चौबीस साल, सात महीने और चौदह दिन हो चुकी थी, इस देश के उन लाखों ‘सर्टिफाइड’ युवाओं में से एक था जिनके पास डिग्रियों का वजन तो बहुत था, पर जेब का वजन हल्का था। उसने बड़े चाव और भारी-भरकम फीस देकर पहले इंजीनियरिंग की, और जब वहां स्कोप खत्म होता दिखा, तो पिताजी के प्रोविडेंट फंड (PF) का एक बड़ा हिस्सा लगवाकर एमबीए (MBA) की चमकीली डिग्री भी हासिल कर ली। उस समय लगा था कि कॉर्पोरेट जगत लाल कालीन बिछाकर उसका स्वागत करेगा। पर आज की तारीख में उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि वह घर में बिना कोई आवाज किए चाय की केतली उठाना सीख गया था।
वह दबे पांव रसोई की तरफ बढ़ा। घर के इस हिस्से में सुबह-सुबह कदम रखना किसी बारूदी सुरंग पर चलने जैसा था। वहां पिताजी अखबार हाथ में लिए चाय की चुस्कियां ले रहे थे। अखबार का पन्ना ‘पॉलिटिक्स’ और ‘घोटालों’ से भरा था, लेकिन पिताजी की नजरें सीधे ‘वर्गीकृत’ (Classified) यानी नौकरियों वाले पन्ने पर टिकी थीं।
चंदर ने जैसे ही केतली उठाई, पिताजी ने अखबार के चश्मे के ऊपर से उसे देखा। वह नजर कोई आम नजर नहीं थी। वह एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी की ‘ऑडिटिंग’ वाली नजर थी।
“उठ गए मिस्टर सीईओ?” पिताजी की आवाज में शक्कर कम और तंज की मलाई ज्यादा थी। “हॉवर्ड यूनिवर्सिटी से कोई ईमेल आया या अभी देश के ही स्टार्टअप्स तुम्हें रिजेक्ट कर रहे हैं?”
चंदर ने बिना कुछ बोले कप में चाय छानी। यह रोज़ का नाटक था। इस चाय के साथ जो ‘ताने की मलाई’ मिलती थी, वह चंदर के दिन का पहला भोजन थी।
पिताजी ने अखबार को मेज पर पटका, “शर्मा जी का लड़का कल ही बेंगलुरु की किसी कंपनी में पैकेट… क्या कहते हैं उसे… हां, पैकेज पर लगा है। बारह लाख का पैकेज है! और एक तुम हो, जिसने कॉलेज में इतनी फीस जमा की कि उस पैसे से मैं शहर के बाईपास पर दो कट्टे जमीन खरीद लेता। आज जमीन की कीमत आसमान छू रही होती और तुम्हारी काबिलियत जमीन के अंदर धंस रही है।”
चंदर ने चाय का घूंट लिया। वह कड़वी थी, पर पिताजी के शब्दों से ज्यादा नहीं। वह चुप रहा। बेरोजगारी का पहला नियम यही है—’प्रतिवाद मत करो, सिर्फ सिर झुकाओ।’ अगर आप बेरोजगार हैं, तो आपके पास आत्मसम्मान रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
रसोई के कोने से मां ने प्रवेश किया। मां का चरित्र इस कहानी में हमेशा ‘सहानुभूति’ और ‘ब्लैकमेलिंग’ के बीच झूलता रहता था। मां ने चंदर के सिर पर हाथ फेरा, लेकिन उनके शब्दों में वही पुराना पारिवारिक डर था, “अरे छोड़ो भी जी, बच्चे के पीछे क्यों पड़े हो। मैं तो कहती हूँ चंदर बेटा, वो जो बगल वाले मोहल्ले में शर्मा जी के भाई की राशन की दुकान है, वहां एक कंप्यूटर ऑपरेटर की जरूरत है। सात हजार रुपए दे रहे हैं। तब तक वही कर लो, कम से कम घर में बैठे-बैठे तुम्हारा शरीर तो नहीं जंग खाएगा।”
“मां! मैं एमबीए हूँ!” चंदर से अब रहा नहीं गया। “राशन दुकान पर बैठकर शक्कर और चावल का हिसाब करने के लिए मैंने दो साल मार्केटिंग की थ्योरी नहीं पढ़ी थी।”
पिताजी जोर से हँसे, ऐसी हँसी जो सीधे रीढ़ की हड्डी में चुभती है, “एमबीए हो! बहुत बड़े लाटसाहब हो! जब तक जेब में खुद के कमाए पांच सौ रुपए न हों, तब तक तुम्हारी उस डिग्री की कीमत रद्दी के भाव से ज्यादा नहीं है। यह जो अकड़ है ना तुम्हारी, इसे किसी सरकारी दफ्तर के बाबू के सामने दिखाना, वो एक मिनट में तुम्हारी मार्केटिंग का कबाड़ा बना देगा।”
चंदर अपना कप उठाकर सीधे अपने कमरे में आ गया और दरवाजा बंद कर लिया। इस कमरे की दीवारें गवाह थीं कि कैसे एक ‘घर का लाडला’ धीरे-धीरे ‘घर का सबसे बड़ा नकारा’ बन जाता है।
उसे याद आया वो दिन, जब बारहवीं कक्षा में उसके नब्बे प्रतिशत नंबर आए थे। पूरे मोहल्ले में दीवाली जैसा माहौल था। पिताजी ने छाती ठोककर कहा था, “मेरा बेटा देश का नाम रोशन करेगा। यह मामूली नौकरी के लिए नहीं बना है।” रिश्तेदार घर आकर उसकी आरती उतारते थे। फूफा जी कहते थे कि लड़का आईएएस बनेगा, मौसा जी कहते थे कि यह विदेश जाएगा। उस समय चंदर घर का ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ था—हर तरफ उसी की गर्मी थी।
फिर आया कॉलेज का दौर। फीस के नाम पर हर साल लाखों रुपए पानी की तरह बहाए गए। चंदर को लगता था कि वह एक निवेश (Investment) है, जो कुछ सालों बाद भारी मुनाफे के साथ वापस लौटेगा। लेकिन जैसे ही कॉलेज का गेट पीछे छूटा, बाजार की मंदी और सिस्टम की लाचारी ने उसका स्वागत किया।
शुरुआती छह महीने तो ‘एटीट्यूड’ में बीते। चंदर बड़ी-बड़ी कंपनियों के इंटरव्यू में जाता और सोचता, “ये मुझे पांच लाख का पैकेज दे रहे हैं? मेरी औकात इससे ज्यादा है।” लेकिन जब साल बीत गया, और बैंक के लोन की किश्त (EMI) के नोटिस घर आने लगे, तब चंदर का एटीट्यूड ‘प्लीज कंसीडर माय प्रोफाइल’ (कृपया मेरी प्रोफाइल पर विचार करें) में बदल गया।
अब स्थिति यह थी कि फूफा जी, जो कभी उसे आईएएस बनाने पर तुले थे, अब फोन करके पूछते थे, “और बेटा, कहीं कुछ सेटिंग बैठी या अभी भी बस फॉर्म ही भर रहे हो?” मौसा जी अब उसे देखकर रास्ता बदल लेते थे, इस डर से कि कहीं चंदर उनसे कुछ उधार न मांग ले।
घर के लाडले से लेकर नकारा बनने का यह सफर बहुत सुचारू था। इसमें किसी एक्सीडेंट की जरूरत नहीं पड़ी; इसे हमारे देश के ‘एजुकेशन सिस्टम’ और ‘मार्केट’ ने मिलकर इतनी खूबसूरती से अंजाम दिया था कि युवा को पता ही नहीं चलता कि कब उसकी पीठ पर ‘बेरोजगार’ का अदृश्य ठप्पा लगा दिया गया।
चंदर ने बिस्तर पर लेटकर छत के पंखे को देखा, जो बिना थके गोल-गोल घूम रहा था। उसने सोचा, “यह पंखा भी मेरी जिंदगी जैसा ही है। चल बहुत रहा है, मेहनत पूरी कर रहा है, लेकिन पहुंच कहीं नहीं रहा है। वहीं का वहीं खड़ा है।”
तभी उसके फोन पर एक व्हाट्सएप मैसेज फ्लैश हुआ। यह उसके दोस्त मोंटू का मैसेज था। मोंटू भी उसी की तरह ‘बेरोजगारी संघ’ का एक सक्रिय सदस्य था।
मैसेज में लिखा था: “भाई, कलेक्ट्रेट (Collectorate) के बाहर मिल। राज्य विकास विभाग में कुछ संविदा (Contract) की नौकरियां निकली हैं। सुना है वहां बिना ‘ऊपर की कमाई’ दिखाए फॉर्म आगे नहीं बढ़ता। चल चलकर देखते हैं कि इस बार हमारी डिग्रियों का क्या रेट लग रहा है।”
चंदर बिस्तर से उठा। उसने अपनी अलमारी खोली, अपनी सबसे साफ शर्ट निकाली—वही शर्ट जो उसने पिछले तीन सालों से हर इंटरव्यू में पहनी थी। उसने अपनी डिग्रियों की फाइल उठाई, जिसे वह किसी पवित्र ग्रंथ की तरह संभालकर रखता था।
उसने शीशे में खुद को देखा। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, जो रातों को जागकर ‘करंट अफेयर्स’ रटने और भविष्य की चिंता करने से आए थे। उसने एक गहरी सांस ली और खुद से कहा, “चलो, आज फिर से अपनी इस ‘बेरोजगारी की अर्थी’ को सड़क पर टहला कर लाते हैं। देखते हैं, आज कौन सा सरकारी बाबू हमारी बेबसी का तमाशा देखता है।”
घर के मुख्य दरवाजे से बाहर निकलते वक्त, पीछे से फिर पिताजी की आवाज गूंजी, “शाम को आते वक्त सब्जी लेते आना, कम से कम किसी काम तो आओ!”
चंदर ने बिना मुड़े हाथ हिला दिया। वह घर से बाहर निकल चुका था, ‘सुबह की चाय और ताने की मलाई’ हजम करके, व्यवस्था के उस बड़े दलदल में कूदने के लिए, जहाँ घूसखोरी का साम्राज्य उसका इंतजार कर रहा था।
अध्याय 2: रील्स (Reels) की दुनिया, हकीकत का शून्य
इंस्टाग्राम पर रॉकस्टार, एंप्लॉयमेंट एक्सचेंज में कतार
कलेक्ट्रेट जाने वाले रास्ते पर मोंटू अपनी खटारा बाइक के साथ चंदर का इंतज़ार कर रहा था। मोंटू की बाइक भी इस देश के युवाओं जैसी थी—आवाज़ बहुत करती थी, पेट्रोल ज़्यादा पीती थी, पर वक़्त पर कभी स्टार्ट नहीं होती थी।
मोंटू को देखते ही चंदर ने पूछा, “क्या हुआ बे? सुबह-सुबह कलेक्ट्रेट बुला लिया? वहां कौन सी नौकरी बट रही है?”
मोंटू ने बाइक को किक मारते हुए कहा, “अरे भाई, डेटा एंट्री ऑपरेटर की पोस्ट है। कुल मिलाकर बारह सीटें हैं। और तुझे पता है फॉर्म कितने भरे गए हैं? पैंतालीस हज़ार!”
“पैंतालीस हज़ार?” चंदर का सिर चकरा गया। “बारह सीटों के लिए पैंतालीस हज़ार लोग? इसमें तो आधे से ज़्यादा पीएचडी और बीटेक वाले होंगे।”
“वही तो!” मोंटू ने हंसते हुए कहा। “देश में इतनी डिग्रियां बंट चुकी हैं कि अब समोसे वाला भी चटनी देने से पहले पूछता है कि भाई, बीटेक कंप्यूटर साइंस से की है या मैकेनिकल से?”
बाइक कलेक्ट्रेट की तरफ बढ़ चली। रास्ते में लाल बत्ती पर मोंटू ने अपना मोबाइल निकाला और झट से इंस्टाग्राम की रील्स स्क्रॉल करने लगा। स्क्रीन पर एक उन्नीस साल का लड़का चमचमाती थार गाड़ी के आगे खड़ा होकर नोट उड़ा रहा था। बैकग्राउंड में गाना बज रहा था—“तेरा भाई सिस्टम हिला देगा।” नीचे कैप्शन था: ‘एज 19, ओन बिजनेस, नो 9 टू 5 जॉब!’
मोंटू ने एक गहरी सांस ली, “भाई चंदर, इस लड़के को देख। उन्नीस साल की उम्र में थार खरीद ली इसने। और एक हम हैं, चौबीस के हो गए और आज भी इस पैंतालीस हजार की भीड़ में बारह हजार की नौकरी के लिए अपनी चप्पल घिस रहे हैं। कभी-कभी लगता है कि हमने पढ़ाई करके दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह कर दिया।”
चंदर ने मोंटू के हाथ से फोन छीनकर जेब में डाल दिया। “मोंटू, यह रील्स की दुनिया है। यहाँ हर दूसरा आदमी करोड़पति है और हर तीसरा आदमी मोटिवेशनल स्पीकर। इस आभासी दुनिया में सब रॉकस्टार हैं, लेकिन जैसे ही तुम कलेक्ट्रेट के एंप्लॉयमेंट एक्सचेंज (रोजगार कार्यालय) की खिड़की पर आओगे, हकीकत का शून्य तुम्हारी छाती पर आकर लगेगा।”
जब दोनों कलेक्ट्रेट पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर चंदर के पैर जम गए।
धूप तेज थी और कलेक्ट्रेट की जर्जर इमारत के बाहर एक अंतहीन इंसानी अजगर रेंग रहा था। हजारों लड़के-लड़कियां, हाथों में प्लास्टिक की पारदर्शी फाइलों में बंद अपनी डिग्रियां लेकर खड़े थे। पसीने से तर-बतर चेहरे, आँखों में एक अजीब सी लाचारी और होठों पर सूखापन। कोई पेड़ की छांव में बैठा ‘सामान्य ज्ञान’ की किताब रट रहा था, तो कोई कोने में खड़ा होकर फोन पर अपनी मां से कह रहा था, “हां मां, लाइन बहुत लंबी है, शायद शाम हो जाएगी।”
चंदर ने उस कतार को देखा। यह सिर्फ बेरोजगारों की लाइन नहीं थी, यह इस देश की सबसे पढ़ी-लिखी और सबसे बेकार बैठी ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ की फौज थी। यहाँ हर चेहरे पर एक ही कहानी लिखी थी—मेहनत पूरी, पर नतीजा शून्य।
“मोंटू,” चंदर धीरे से बोला, “हम इस लाइन में खड़े होकर अपनी काबिलियत साबित करने आए हैं या अपनी लाचारी का सर्टिफिकेट रिन्यू कराने?”
मोंटू ने चंदर को लाइन में धक्का देते हुए कहा, “फिलहाल चुपचाप खड़े हो जाओ भाई। यहाँ ज्ञान मत बांटो, वरना पीछे वाले लड़के तुम्हें यहीं कूट देंगे। वो सुबह चार बजे से लाइन में लगे हैं।”
लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। चंदर के ठीक आगे एक लड़का खड़ा था जिसके पास एक भारी-भरकम फाइल थी। चंदर ने बातचीत शुरू करने के लिए पूछा, “भाई, कहाँ से आए हो?”
उसने थक कर पीछे देखा, “झांसी से आया हूँ भाई। यह मेरा सोलहवां फॉर्म है। पिछले साल रेलवे का एग्जाम दिया था, पेपर लीक हो गया। उससे पहले पुलिस की भर्ती देखी, कोर्ट में केस चल रहा है। अब इस कलेक्ट्रेट की नौकरी के भरोसे आया हूँ, यहाँ सुना है लोकल लेवल पर ही सेटिंग हो जाती है।”
चंदर ने उसकी फाइल पर नजर डाली। ऊपर ही एम.टेक (M.Tech) का सर्टिफिकेट चमक रहा था। चंदर दंग रह गया, “तुम एम.टेक करके बारह हजार की संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) नौकरी के लिए झांसी से यहाँ आए हो?”
उस लड़के ने एक कड़वी मुस्कान के साथ कहा, “भाई, जब पेट में भूख चूहे की तरह नहीं, भेड़िये की तरह कूदने लगे ना, तो एम.टेक और पीएचडी के कागज सिर्फ रद्दी लगते हैं। घर पर बूढ़े बाप की दवाइयों का खर्च है, छोटी बहन की शादी है। बाजार में इज्जत बची नहीं है। अब तो बस कोई भी नौकरी मिल जाए, जिसके आगे ‘सरकारी’ शब्द लिखा हो, भले ही झाड़ू लगाने का काम क्यों न हो।”
चंदर को लगा जैसे किसी ने उसके चेहरे पर तमाचा मार दिया हो। वह खुद को बहुत बड़ा पढ़ा-लिखा समझ रहा था, लेकिन यहाँ उससे भी बड़े सूरमा लाइन में धूल फांक रहे थे। डिजिटल इंडिया के इस दौर में, जहाँ सरकारें दावा कर रही थीं कि सब कुछ एक क्लिक पर हो रहा है, वहाँ देश का युवा आज भी चार-चार घंटे धूप में खड़े होकर एक कागज जमा करने के लिए तरस रहा था।
दो घंटे की मशक्कत के बाद जब चंदर खिड़की के पास पहुंचा, तो अंदर बैठे क्लर्क ने उसकी तरफ देखा भी नहीं। क्लर्क के एक हाथ में गुटखा था और दूसरे हाथ से वह कंप्यूटर पर ताश (Solitaire) खेल रहा था।
“फॉर्म लाओ!” क्लर्क ने बिना सिर उठाए रूखे स्वर में कहा।
चंदर ने अपनी फाइल आगे बढ़ा दी। क्लर्क ने सरसरी निगाह से उसकी एमबीए की डिग्री देखी और एक ठंडी हंसी हँसा, “एमबीए? मार्केटिंग? चलो, फॉर्म यहाँ रख दो और जाओ।”
“सर, इसका कोई रिसीविंग (पावती) या रोल नंबर?” चंदर ने पूछा।
क्लर्क ने गुटखे की पीक बगल के थूकदान में थूकी और कहा, “अरे जाओ भाई, जब लिस्ट निकलेगी तो बोर्ड पर टांग दी जाएगी। ज्यादा सवाल मत करो, पीछे लाइन देखो कितनी लंबी है।”
चंदर कलेक्ट्रेट के गेट से बाहर निकला, तो उसका सिर घूम रहा था। उसने मोबाइल निकाला। इंस्टाग्राम पर अभी भी वही लड़का थार गाड़ी के साथ नाच रहा था। चंदर ने झटके से फोन बंद किया। रील्स की वह रंगीन, अमीर दुनिया और कलेक्ट्रेट की यह बदबूदार, लाचार हकीकत—इन दोनों के बीच जो खाई थी, वही आज के युवा का सबसे बड़ा ‘कंफ्यूजन’ थी।
अध्याय 3: फॉर्म की माया, लीक का साया
सालों की तैयारी, दो घंटे का इम्तिहान और दस मिनट में पेपर लीक
कलेक्ट्रेट की उस बेनतीजा लाइन से लौटने के बाद चंदर के भीतर का ‘कंफ्यूज्ड युवा’ थोड़ा गंभीर होने लगा था। उसने तय किया कि वह इन छोटी-मोटी संविदा की नौकरियों के चक्कर में अपना समय बर्बाद नहीं करेगा। उसने एक बड़ा फैसला लिया—वह राज्य लोक सेवा आयोग (State PSC) की परीक्षा देगा। अधिकारी बनेगा, सीधे सिस्टम के भीतर घुसकर उसे बदलेगा।
अगले छह महीने चंदर के लिए एक अज्ञातवास की तरह थे। उसने खुद को एक छोटे से कमरे में बंद कर लिया। कमरे की दीवारें अब भारत के नक्शे, इतिहास की तारीखों और अर्थशास्त्र के फॉर्मूलों से पट चुकी थीं। सुबह पांच बजे उठना, बिना चाय के ताने सहे चुपचाप किताबों में डूब जाना और रात को बारह बजे तक आंखें गड़ाए रखना—यह उसकी दिनचर्या बन गई थी।
पिताजी का रवैया थोड़ा बदला था, पर तंज का मीटर अभी भी चालू था। जब भी चंदर को पढ़ते देखते, कहते, “चलो, देर से ही सही, अक्ल तो आई। राजा बाबू अब सीधे कलेक्टर बनेंगे। बस देखना, परीक्षा समय पर हो जाए, वरना इस देश में पंचवर्षीय योजनाएं सिर्फ सरकारें नहीं, सरकारी परीक्षाएं भी चलाती हैं।”
चंदर ने उन तानों को अपनी ताकत बनाया। उसने ‘फॉर्म की माया’ में खुद को पूरी तरह झोंक दिया। पांच हजार रुपए का फॉर्म भरा गया, जो चंदर ने अपनी मां के सोने के कंगन को गिरवी रखकर मिले पैसों से बचाया था। परीक्षा की तारीख आई—15 मार्च।
15 मार्च की सुबह, चंदर परीक्षा केंद्र पर पहुंचा। उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। यह सिर्फ दो घंटे का इम्तिहान नहीं था, यह उसके पिछले दो साल की बेरोजगारी का इंसाफ था। उसने प्रश्नपत्र हाथ में लिया। उसकी आंखें चमक उठीं—सारे सवाल वही थे जो उसने रात-रात भर जागकर रटे थे। उसने ओएमआर (OMR) शीट पर काले गोले इस तरह भरे जैसे वह अपने दुश्मनों की छाती पर बंदूक दाग रहा हो।
जब वह परीक्षा हॉल से बाहर निकला, तो उसके चेहरे पर एक असीम शांति थी। उसने मोंटू को फोन किया, “भाई! इस बार अपना सिलेक्शन पक्का है। प्री-एग्जाम तो मैं टॉप कर रहा हूँ।”
मोंटू की तरफ से कोई खुशी की आवाज नहीं आई। वहां सिर्फ सन्नाटा था।
“क्या हुआ बे मोंटू? तू खुश नहीं है?” चंदर ने पूछा।
मोंटू ने भारी आवाज में कहा, “चंदर, जरा अपना व्हाट्सएप खोल और कलेक्ट्रेट वाले ग्रुप को देख।”
चंदर के हाथ कांपने लगे। उसने कांपती उंगलियों से व्हाट्सएप खोला। ग्रुप पर एक पीडीएफ (PDF) फाइल तैर रही थी। नीचे लिखा था: ‘एग्जाम शुरू होने से दो घंटे पहले ही पूरा प्रश्नपत्र उत्तरों के साथ टेलीग्राम और व्हाट्सएप पर ₹500 में बिक रहा था।’
चंदर के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। उसने उस पीडीएफ को खोला। हर एक सवाल, हर एक ऑप्शन, हूबहू वही था जो वह अभी-अभी अपनी ओएमआर शीट पर काले गोले बनाकर आया था।
परीक्षा हॉल के बाहर जो लड़के अभी तक मुस्कुरा रहे थे, वे अचानक रोने लगे। किसी ने अपना सिर दीवार पर दे मारा, तो किसी ने अपनी किताबों के पन्ने फाड़कर हवा में उड़ा दिए। सालों की मेहनत, मां के कंगन के पैसे, रातों का जागना—सब कुछ सिर्फ दस मिनट में ‘लीक का साया’ बनकर हवा में उड़ चुका था।
चंदर वहीं सड़क के किनारे फुटपाथ पर बैठ गया। उसके हाथ में जो पेन था, जिससे उसने अभी-अभी अपना भविष्य लिखने की कोशिश की थी, वह उसे एक धारदार हथियार जैसा लगा, जिससे सिस्टम ने उसकी उम्मीदों का गला रेत दिया था।
शाम को जब वह घर लौटा, तो घर में अजीब सा सन्नाटा था। पिताजी टीवी के सामने बैठे थे। टीवी पर न्यूज एंकर चिल्ला रहा था—“परीक्षा पारदर्शी तरीके से संपन्न हुई, विपक्ष अफवाह फैला रहा है।”
पिताजी ने टीवी बंद किया। उन्होंने चंदर की तरफ देखा। इस बार उनकी आंखों में तंज नहीं था, एक अजीब सी लाचारी और दुख था। उन्होंने चंदर के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “बेटा, तुम्हारी मां ने रात के लिए आलू की सब्जी बनाई है। खा लो।”
चंदर अपने कमरे में गया और बिना रोशनी किए अंधेरे में लेट गया। उसे समझ आ गया था कि इस देश में परीक्षा की तैयारी करना सिर्फ किताबों को पढ़ना नहीं है, बल्कि उस ‘लीक माफिया’ और ‘भ्रष्ट सरकार’ से लड़ना भी है, जो हर बार युवा की किस्मत का सौदा बंद कमरों में नोटों की गड्डियों के बदले कर देती है।
अध्याय 4: व्यंग्य काव्य: “डिग्री हाथ में, कटोरा साथ में”
(चंदर के कमरे की डायरी से निकला एक व्यंग्य काव्य, जो आज के हर बेरोजगार युवा की अंतरात्मा की आवाज है)
डिग्री लेकर हाथ में, हम खड़े हैं बाजार में,
साहब बैठे सो रहे हैं, अपनी एसी कार में।
पढ़-लिखकर हम बन गए, इस देश के लाचार से,
रोजगार की भीख मांगें, इस निकम्मी सरकार से।
एमबीए की मार्केटिंग, अब राशन दुकान पर है,
बीटेक का वो सॉफ्टवेयर, चाय के उठान पर है।
पीएचडी के होनहार, चपरासी की कतार में,
कैसा यह विकास है जो आया इस दुलार में?
सालों साल हम जागते, रातों को दिन बनाते हैं,
बूढ़े बाप के खून को, हम स्याही में मिलाते हैं।
फॉर्म की जो फीस है, वो मां का गहना बेचकर,
हम तो परीक्षा देने जाते, अपना सब कुछ हारकर।
पर परीक्षा से पहले ही, पेपर लीक हो जाता है,
मंत्रालय का कोई बाबू, माल दबाकर सो जाता है।
नेताजी फिर मंच पर, आकर भाषण झाड़ते,
“पकौड़े तलो भाइयों!”—युवाओं को दुत्कारते।
डिजिटल इंडिया का नारा है, फोन में नेट भारी है,
पर हकीकत में देखो तो, हर युवा आभारी है।
रील्स में हम ढूंढते हैं, अपनी नकली खुशियां,
और कलेक्ट्रेट के बाहर, घिस रही हैं जूतियां।
कुर्सी पर जो बैठे हैं, वो नोटों के दीवाने हैं,
हमारी इस बेबसी के, उनके पास सौ बहाने हैं।
अब तो बस यह हाल है, इस पढ़े-लिखे समाज में—
डिग्री सजी है फ्रेम में, और कटोरा आ गया हाथ में!
(कहानी का यह पहला भाग यहाँ समाप्त होता है, जहाँ युवा का कंफ्यूजन अब व्यवस्था के प्रति एक गहरे आक्रोश में बदलने लगा है। )
अध्याय 3: सरकारी दफ्तर की सैर
टेबल नंबर 4 से कमरा नंबर 420 तक का चक्रव्यूह
पेपर लीक होने का हफ़्ता बीत चुका था। सरकार ने एक छोटी सी प्रेस विज्ञप्ति जारी करके अपना पल्ला झाड़ लिया था—“मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति (Committee) का गठन कर दिया गया है। अगली परीक्षा तक सभी छात्र धैर्य बनाए रखें।”
‘धैय’—यह एक ऐसा मुफ़्त का शब्द है जिसे सरकारें बेरोजगारों के जख्मों पर नमक की तरह छिड़कती हैं। चंदर के घर का माहौल अब किसी श्मशान घाट जैसा हो चुका था। पिताजी ने ताने मारना भी बंद कर दिया था, और उनका यह मौन तानों से ज्यादा जानलेवा था। माँ अक्सर उसे देखकर अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछ लेती थीं।
तभी घर में एक नया संकट आ खड़ा हुआ। चंदर के बाबूजी की, जो कि सिंचाई विभाग से क्लर्क के पद से रिटायर हुए थे, पिछले चार महीने से पेंशन रुक गई थी। वजह? कलेक्ट्रेट के पेंशन विभाग का एक नया नियम आया था कि सभी रिटायर्ड कर्मचारियों को अपना ‘जीवित प्रमाण पत्र’ (Life Certificate) नए डिजिटल पोर्टल पर वेरीफाई करवाना होगा।
बाबूजी ने तीन बार कलेक्ट्रेट के चक्कर काटे थे, लेकिन हर बार उनका अंगूठा मशीन पर मैच नहीं करता था। बूढ़ी, सूखी चमड़ी की लकीरें उस आधुनिक ‘डिजिटल इंडिया’ की मशीन को समझ नहीं आ रही थीं। नतीजा यह हुआ कि सिस्टम के कागजों में बाबूजी ‘शंकास्पद’ हो गए। यानी, जब तक कलेक्ट्रेट का बड़ा बाबू उन्हें खुद आँखों से देखकर फाइल पर साइन नहीं करेगा, तब तक वे कागजों में ‘जिंदा’ नहीं माने जाएंगे।
“चंदर,” एक सुबह बाबूजी ने खांसते हुए अपनी फटी हुई चप्पलें पहनीं। “आज जरा मेरे साथ कलेक्ट्रेट चलो। मेरी सांस फूलती है, वहां की सीढ़ियां अब मुझसे नहीं चढ़ी जातीं।”
चंदर का दिल बैठ गया। जो युवा कुछ दिन पहले तक वहां अफसर बनने का ख्वाब देख रहा था, आज वह अपने ही बाप के जिंदा होने का सबूत देने उसी कलेक्ट्रेट जा रहा था।
कलेक्ट्रेट की इमारत सदियों पुरानी थी। दीवारों पर पान और गुटके की पीक से ऐसी नक्काशी की गई थी कि अजंता-एलोरा की गुफाएं भी शरमा जाएं। हर कोने में फाइलों का अंबार था, जिन पर धूल की ऐसी मोटी परत जमी थी कि अगर उन्हें झाड़ा जाए तो एक नया रेगिस्तान पैदा हो जाए।
बाबूजी चंदर को लेकर कमरा नंबर 12 के बाहर पहुंचे। दरवाजे पर धुंधली नेमप्लेट पर लिखा था: ‘वरिष्ठ लिपिक – पेंशन शाखा’।
भीतर एक साहब बैठे थे, जिनकी कुर्सी के पीछे एक बड़ा सा कैलेंडर लटका था, जिस पर ‘ईमानदारी ही सर्वोत्तम नीति है’ लिखा हुआ था। साहब का नाम था मिश्रा जी। मिश्रा जी इस समय बड़े ध्यान से अपनी उंगली से कान खुजा रहे थे और उनके चश्मे का एक शीशा धागे से बंधा हुआ था।
“प्रणाम मिश्रा जी,” बाबूजी ने हाथ जोड़कर झुकते हुए कहा।
मिश्रा जी ने कान से उंगली निकाली, उसे टेबल पर झाड़ा और फिर बड़ी बेरुखी से देखा, “हूँ? कौन? क्या काम है?”
“अरे साहब, मैं रामनाथ… पिछले महीने भी आया था। मेरी पेंशन रुकी हुई है। डिजिटल मशीन में मेरा अंगूठा नहीं आ रहा है। यह मेरा बेटा है, एमबीए है। यह सारे कागज़ संभाल कर लाया है।” बाबूजी ने चंदर की तरफ इशारा किया।
चंदर ने तुरंत अपनी वो मशहूर प्लास्टिक की फाइल आगे बढ़ाई, “साहब, ये बाबूजी के सारे ओरिजिनल डॉक्यूमेंट्स हैं। आधार कार्ड, पैन कार्ड, पीपीओ नंबर, और डॉक्टर का सर्टिफिकेट भी कि बाबूजी पूरी तरह स्वस्थ और जीवित हैं।”
मिश्रा जी ने फाइल को ऐसे छुआ जैसे उसमें करंट हो। उन्होंने एक पन्ना पलटा, फिर चश्मा नाक पर टिकाकर चंदर को ऊपर से नीचे तक देखा।
“एमबीए हो?” मिश्रा जी के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आई। “बहुत बढ़िया। लेकिन बेटा, यह यूनिवर्सिटी का कैंपस नहीं है, यह सरकारी दफ्तर है। यहाँ डिग्रियां नहीं, ‘नियम’ चलते हैं।”
“साहब, नियम के मुताबिक ही तो सारे कागज़ पूरे हैं,” चंदर ने संयम रखते हुए कहा।
“कागज़ पूरे हैं, पर ‘वजन’ गायब है,” मिश्रा जी ने अपनी कुर्सी के हत्थे पर हाथ मारते हुए कहा।
“वजन? मतलब?” चंदर का कंफ्यूजन फिर से जाग उठा।
मिश्रा जी ने चंदर के सीधेपन पर तरस खाते हुए अपनी आवाज धीमी की और मेज के नीचे की तरफ इशारा किया, “देखो भाई, फाइल जब आगे बढ़ती है, तो उसे हवा की जरूरत होती है। और इस दफ्तर में हवा सिर्फ ‘गांधी जी’ के पंखे से आती है। पांच हजार रुपए लगेंगे। बाबूजी का अंगूठा भी लग जाएगा और कंप्यूटर भी उन्हें ‘जीवित’ घोषित कर देगा।”
“पांच हजार रुपए? सिर्फ यह साबित करने के लिए कि मेरे पिता जिंदा हैं?” चंदर की रगों में खून खौलने लगा। “यह तो घूसखोरी है साहब! मैं एक रुपया नहीं दूंगा। मेरे बाबूजी ने तीस साल इसी सरकार की सेवा की है।”
मिश्रा जी का चेहरा अचानक सख्त हो गया। उन्होंने फाइल बंद की और उसे उठाकर सबसे नीचे वाली दराज में फेंक दिया। “घूसखोरी? जुबान संभाल के बात करो लड़के! अपनी ये बड़ी-बड़ी बातें बाहर ले जाओ। चलो, निकलो यहाँ से। फाइल में ‘तकनीकी खामी’ है, जांच में समय लगेगा। अगले महीने आना।”
“मिश्रा जी…” बाबूजी ने चंदर का हाथ पकड़ा, उनकी आँखें डबडबा आई थीं। “बेटा, चुप हो जा। इनसे बहस मत कर।”
लेकिन चंदर का सब्र का बांध टूट चुका था। वह बाबूजी को लेकर बाहर आ गया। “बाबूजी, आप रुकिए। मैं इस दफ्तर के सबसे बड़े अधिकारी, यानी कलेक्टर साहब के पास जाऊंगा। मैं देखता हूँ कि इस कलेक्ट्रेट में न्याय मिलता है या सिर्फ नोट चलते हैं।”
कलेक्टर साहब का कमरा यानी ‘कमरा नंबर 420’ (यह कलेक्ट्रेट का प्रशासनिक विंग था)। बाहर दो बंदूकधारी गार्ड खड़े थे और अंदर जाने के लिए रईसों और नेताओं की एक कतार लगी थी। आम आदमी को वहां फटकने की भी इजाजत नहीं थी।
चंदर करीब तीन घंटे तक कलेक्ट्रेट के बरामदे में खड़ा रहा। दोपहर के दो बज चुके थे। आखिरकार, जब एक स्थानीय नेता जी अपने चमचों के साथ बाहर निकले, तो चंदर ने मौका पाकर दरवाजे के भीतर कदम रख दिया।
अंदर का नजारा बाहर की दुनिया से बिल्कुल अलग था। आलीशान एसी चल रहा था, मखमली सोफे बिछे थे और बड़ी सी महोगनी की मेज के पीछे कलेक्टर साहब (Shri 420 Prasad) बैठे थे। वे अपने आईपैड पर कुछ देख रहे थे।
“सर, मेरी एक शिकायत है!” चंदर ने सीधे मेज के पास जाकर कहा।
कलेक्टर साहब ने चौंककर सिर उठाया। एक आम लड़के को इस तरह अपने केबिन में देखकर वे असहज हो गए। उन्होंने बेल बजाई, पर चंदर ने तुरंत बोलना शुरू कर दिया।
“सर, नीचे कमरा नंबर 12 में मिश्रा जी मेरे बुजुर्ग और बीमार पिता से पांच हजार रुपए की रिश्वत मांग रहे हैं। सिर्फ इसलिए कि वे उनकी पेंशन चालू कर सकें। सर, मैं पढ़ा-लिखा युवा हूँ, हाल ही में पेपर लीक का शिकार हुआ हूँ। क्या इस देश में ईमानदारी से जीने की कोई सजा है?”
कलेक्टर साहब ने चंदर की बात सुनी। उनके चेहरे पर कोई गुस्सा या हैरानी नहीं थी। उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़े, मुस्कुराए और बड़े ही शांत लहजे में बोले, “बैठो बेटा, बैठो।”
चंदर सोफे पर बैठ गया। उसे लगा कि शायद देश में अभी भी कुछ अच्छे अफसर बाकी हैं।
कलेक्टर साहब ने पानी का गिलास चंदर की तरफ बढ़ाया, “तुम्हारी बातें सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई। देश को तुम जैसे ही जागरूक और ईमानदार युवाओं की जरूरत है। लेकिन बेटा, तुम सिस्टम को बहुत सतही तरीके से देख रहे हो।”
“मतलब सर?”
“मतलब यह,” कलेक्टर साहब ने झुकते हुए कहा, “कि जो पांच हजार मिश्रा जी मांग रहे हैं, उसका सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा उनके पास जाता है। बाकी हिस्सा ऊपर तक आता है… यहाँ तक, और यहाँ से भी ऊपर मंत्रालय तक जाता है। यह एक चेन (Chain) है। अगर मैं मिश्रा जी को सस्पेंड कर भी दूँ, तो कल उनकी जगह जो नया बाबू आएगा, वो पांच की जगह सात हजार मांगेगा क्योंकि उसे पिछले महीने का घाटा भी पूरा करना होगा।”
चंदर सन्न रह गया। उसका दिमाग सुन्न हो गया।
कलेक्टर साहब ने आगे कहा, “तुमने एमबीए किया है ना? अर्थशास्त्र (Economics) तो समझते ही होगे। इसे कहते हैं ‘सिस्टम का फ्यूजन’। यहाँ हर चीज का एक रेट फिक्स है। तुम लड़ोगे, तो अपनी जवानी कोर्ट-कचहरी के चक्करों में बर्बाद कर लोगे। मेरी मानो, समझदारी दिखाओ। पांच हजार दे दो, बाबूजी की पेंशन शुरू करवाओ और खुद किसी प्राइवेट नौकरी की तलाश करो। इस देश का सिस्टम बदलने की कोशिश मत करो, यह वैसा ही रहेगा।”
कलेक्टर साहब ने दोबारा अपने आईपैड पर उँगलियाँ चलानी शुरू कर दीं। चंदर के लिए इंटरव्यू खत्म हो चुका था।
वह बिना कुछ बोले, लड़खड़ाते कदमों से कमरे से बाहर निकल आया। बाहर धूप और तेज हो चुकी थी। कलेक्ट्रेट के गेट पर बाबूजी एक पेड़ की छांव में बैठे अपनी सुखी हुई सूती धोती से पसीना पोंछ रहे थे।
चंदर ने बाबूजी को देखा, फिर कलेक्ट्रेट की उस विशाल, भ्रष्ट इमारत को देखा। उसका कंफ्यूजन अब पूरी तरह गायब हो चुका था, और उसकी जगह ले चुका था एक गहरा, सुलगता हुआ आक्रोश। उसे समझ आ गया था कि जब सरकार ही सबसे बड़ी घूसखोर हो, तो वहां न्याय की भीख मांगना सबसे बड़ी बेवकूफी है।
उसने जेब से अपना मोबाइल निकाला और मोंटू को डायल किया, “मोंटू, कहाँ है तू? मुझे कलेक्ट्रेट के पीछे वाली चाय की दुकान पर मिल। मुझे सिस्टम से लड़ने का एक नया, डिजिटल तरीका सूझा है।”
अध्याय 4: बाबू, नेता और ‘चाय-पानी’
चुनाव के वादे, जनता के दावे और वीआईपी संस्कृति का नग्न तांडव
कलेक्ट्रेट के ठीक पीछे एक पुराना नीम का पेड़ था, जिसके नीचे सुक्खू की चाय की दुकान थी। सुक्खू की दुकान सिर्फ चाय नहीं बेचती थी, वह शहर के तमाम बेरोजगारों, अदालती मुकदमों में हारे हुए पिताओं और सिस्टम के सताए हुए लोगों का ‘पार्लियामेंट’ थी।
मोंटू वहां पहले से ही बैठा, बेंच पर पैर हिलाते हुए सिगरेट का धुआं उड़ा रहा था। चंदर को देखते ही उसने कड़क चाय के दो कुल्हड़ का ऑर्डर दे दिया।
“कलेक्टर साहब से मिल आया देश का भावी कर्णधार?” मोंटू ने चंदर की उतरी हुई सूरत देखकर पूछा। “क्या बोले साहब? सस्पेंड कर रहे हैं मिश्रा बाबू को, या सीधे तिहाड़ जेल भेज रहे हैं?”
“मोंटू, साहब सस्पेंड नहीं कर रहे हैं, साहब तो ‘रिश्वत की इकॉनमी’ का लेक्चर दे रहे थे,” चंदर ने कड़वाहट से मुस्कुराते हुए चाय का कुल्हड़ उठाया। “उन्होंने साफ कह दिया कि यह एक चेन (Chain) है। नीचे से लेकर ऊपर मंत्रालय तक सबका हिस्सा फिक्स है।”
“मैंने तो पहले ही कहा था,” मोंटू ने चाय की चुस्की ली। “इस देश में अगर तुम्हें बिना रिश्वत के काम करवाना है, तो तुम्हें या तो भगवान का रिश्तेदार होना पड़ेगा या फिर खुद मुख्यमंत्री। वैसे, तूने फोन पर किसी ‘डिजिटल तरीके’ की बात की थी, वो क्या है?”
चंदर ने अपना चटका हुआ मोबाइल मेज पर रखा। “मोंटू, कल से इस शहर में ‘विकास रैली’ शुरू हो रही है। हमारे इलाके के वही माननीय मंत्री जी आ रहे हैं, जिन्होंने पिछले चुनाव में प्रतिवर्ष दो करोड़ रोजगार देने का वादा किया था और जिनकी नाक के नीचे परसों राजस्व सहायक का पेपर लीक हुआ है।”
“हाँ, पूरे शहर में उनके चमकीले पोस्टरों से दीवारें पाट दी गई हैं। पर हमारा उससे क्या लेना-देना?”
“लेना-देना है,” चंदर की आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “मंत्री जी कलेक्ट्रेट के इसी मैदान में जनसभा करने वाले हैं। उनके मंच के ठीक पीछे ‘वीआईपी लाउंज’ बनाया गया है, जहाँ वे कलेक्ट्रेट के बड़े अफसरों और बाबुओं के साथ ‘चाय-पानी’ पर बैठक करेंगे। मिश्रा बाबू भी वहाँ फाइलों का वजन बढ़ाने के लिए मौजूद रहेंगे।”
“तो तू क्या करना चाहता है?” मोंटू थोड़ा घबराया।
“मैंने अपने कॉलेज के दिनों का एक पुराना ब्लॉग और यूट्यूब चैनल री-एक्टिवेट किया है। कल हम दोनों मंत्री जी के उस ‘चाय-पानी’ के वीआईपी केबिन में घुसेंगे। तू अपने फोन से वीडियो रिकॉर्ड करेगा और मैं सीधे मंत्री जी से जनता के सामने, लाइव कैमरे पर पूछूंगा कि बापू की रुकी हुई पेंशन का रेट पाँच हजार क्यों है? और मेहनत करने वाले युवाओं की डिग्रियों का रेट पचास हजार की पीडीएफ क्यों है?”
मोंटू का कुल्हड़ हवा में रुक गया। “भाई, दिमाग खराब हो गया है क्या? मंत्री जी के साथ जो लठैत और पुलिस वाले घूमते हैं ना, वो बिना ‘कंट्रोल + जेड’ दबाए ऐसा कूटेंगे कि मार्केटिंग की सारी थ्योरी भूल जाएगा।”
“डरो मत मोंटू। वे लाठियाँ तब चलाते हैं जब हम सड़कों पर पत्थर फेंकते हैं। जब हम हाथ में ‘लाइव कैमरा’ और ‘सवाल’ लेकर खड़े होंगे, तो उनकी हवा टाइट हो जाएगी। वैसे भी, घर पर बैठकर पिताजी के ताने सुनने से बेहतर है कि व्यवस्था के मुंह पर कालिख पोत कर आएं।”
अगले दिन पूरा शहर भगवा, सफेद और हरे झंडों से पटा पड़ा था। लाउडस्पीकरों पर देशभक्ति के गानों के बीच मंत्री जी के स्वागत के नारे गूंज रहे थे—“हमारा नेता कैसा हो, माननीय जी जैसा हो!”
कलेक्ट्रेट का मैदान इंसानों के सिरों का समंदर बन चुका था। आस-पास के गाँवों से बसें भर-भरकर गरीब जनता को मुफ़्त के खाने के पैकेट और सौ-सौ रुपए के नोट देकर लाया गया था। मंच पर मंत्री जी सफेद कड़क कुर्ता-पायजामा पहने, गले में गेंदे के फूलों का दस किलो का हार लादे हाथ हिला रहे थे।
मंच से उनका भाषण गूंजा, “मेरे प्यारे भाइयों और बहनों! हमारी सरकार ने इस राज्य को ‘डिजिटल’ बना दिया है! अब घूसखोरी का नामोनिशान नहीं है। हमारी पारदर्शी नीतियों के कारण आज का युवा आत्मनिर्भर बन रहा है! हमने नौकरियों की बाढ़ ला दी है…”
नीचे खड़ी जनता ताली बजा रही थी। उसी जनता के बीच चंदर और मोंटू खड़े थे। मोंटू का हाथ कांप रहा था, उसने शर्ट के नीचे अपना मोबाइल छिपा रखा था जिसका लेंस बाहर की तरफ था।
भाषण खत्म हुआ। मंत्री जी भारी सुरक्षा के बीच मंच से उतरे और कलेक्ट्रेट की इमारत के पिछले हिस्से में बने अस्थायी ‘वीआईपी लाउंज’ की तरफ बढ़े। लाउंज के बाहर ‘प्रवेश निषेध’ का बोर्ड था और दो मोटे इंसपेक्टर मूंछों पर ताव दे रहे थे।
चंदर ने गहरी सांस ली। उसने अपनी फाइल को हाथ में लिया, चेहरे पर एक नकली आत्मविश्वास ओढ़ा और सीधे इंसपेक्टर के पास पहुंच गया।
“सर, मैं कलेक्ट्रेट की आईटी विंग से हूँ। कलेक्टर साहब ने मंत्री जी की डिजिटल प्रेजेंटेशन के लिए तुरंत बुलाया है,” चंदर ने इतनी तेजी और अंग्रेजी लहजे में कहा कि इंसपेक्टर का देहाती दिमाग चकरा गया। उसने चंदर की शर्ट और हाथ में लगी डिग्रियों की चमकीली फाइल देखी, उसे लगा कोई बड़ा बाबू या इंजीनियर होगा।
“ठीक है, जाओ, पर जल्दी बाहर आना,” इंसपेक्टर ने रास्ता दे दिया। मोंटू चुपके से चंदर के पीछे हो लिया।
भीतर का नजारा किसी जन्नत से कम नहीं था। बाहर की जनता पचास डिग्री की धूप में सड़ रही थी, और अंदर तीन टन का एसी चल रहा था। काजू, बादाम और पनीर के टिक्के की खुशबू हवा में तैर रही थी। विशाल सोफे पर माननीय मंत्री जी पसरे हुए थे। उनके एक तरफ कलेक्टर श्री 420 प्रसाद हाथ जोड़े खड़े थे, और कोने में मिश्रा बाबू कुछ फाइलों पर दस्तखत करवाने के लिए रेंग रहे थे।
“मंत्री जी, इस बार चुनाव में युवाओं का वोट शत-प्रतिशत हमारे पाले में है। राजस्व सहायक की भर्ती से युवा बहुत खुश हैं,” कलेक्टर साहब मक्खन लगा रहे थे।
मंत्री जी ने काजू चबाते हुए कहा, “बहुत बढ़िया कलेक्टर साहब। बस ध्यान रहे, विपक्ष इस पेपर लीक वाले मामले को ज्यादा तूल ना दे पाए। मीडिया को मैनेज रखिए।”
“जी सर, सब कंट्रोल में है,” कलेक्टर ने सिर झुकाया।
“कुछ भी कंट्रोल में नहीं है, मंत्री जी!”
अचानक आई इस कड़क आवाज से पूरे कमरे में सन्नाटा पसर गया। मंत्री जी का काजू उनके मुंह में ही रुक गया। कलेक्टर साहब ने मुड़कर देखा तो उनके होश उड़ गए—यह वही ‘कन्फ्यूज्ड युवा’ चंदर था।
“कौन है यह? सुरक्षा गार्ड कहाँ हैं?” कलेक्टर साहब चिल्लाए।
“मोंटू, लाइव शुरू करो!” चंदर ने चीखकर कहा। मोंटू ने तुरंत मोबाइल बाहर निकाला और यूट्यूब लाइव का बटन दबा दिया। स्क्रीन पर देखते ही देखते दर्शक जुड़ने लगे, क्योंकि बाहर मैदान में हजारों बेरोजगार पहले से ही फोन पर एक्टिव थे।
“माननीय मंत्री जी!” चंदर कैमरे के सामने खड़ा हो गया, उसकी आवाज में छह साल की बेरोजगारी का पूरा लावा फूट पड़ा था। “आप अभी बाहर मंच पर कह रहे थे कि देश डिजिटल हो गया है और भ्रष्टाचार खत्म हो चुका है। तो फिर मेरे इस ७० साल के बुजुर्ग पिता को, जिसने सरकार की तीस साल सेवा की, खुद को ‘जिंदा’ साबित करने के लिए आपके इस कलेक्ट्रेट के बाबू मिश्रा जी को पाँच हजार की रिश्वत क्यों देनी पड़ रही है?”
चंदर ने मिश्रा बाबू की तरफ उंगली उठाई। मिश्रा बाबू का चेहरा ऐसा हो गया जैसे उन्होंने भूत देख लिया हो। वे सोफे के पीछे छिपने की कोशिश करने लगे।
“और सर!” चंदर ने अपनी डिग्रियों की फाइल मंत्री जी की मेज पर पटक दी, जिससे काजू की प्लेट पलट गई। “यह मेरी इंजीनियरिंग और एमबीए की डिग्रियां हैं। मैंने छह महीने रात-रात भर जागकर पढ़ाई की। लेकिन आपकी नाक के नीचे आपके दलाल पचास हजार रुपए में परीक्षा का पेपर लीक करके टेलीग्राम पर बेच रहे हैं। आप जवाब दीजिए मंत्री जी, आज का पढ़ा-लिखा युवा कहाँ जाए? पकोड़े तले या आपके इन बाबुओं के तलवे चाटे?”
मंत्री जी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उन्होंने कलेक्टर की तरफ देखा, “कलेक्टर! यह क्या बद्तमीजी है? बंद करो इस कैमरे को!”
कलेक्टर साहब चंदर की तरफ झपटे, “लड़के, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुम जेल जाओगे!”
“जेल से नहीं डरता साहब! बेरोजगार की जिंदगी वैसे भी एक खुली जेल ही है,” चंदर ने कैमरे की तरफ देखते हुए कहा। “दोस्तों, देखो यह है हमारे देश का असली ‘वीआईपी लाउंज’ जहाँ एसी की हवा में हमारे भविष्य का सौदा होता है। शेयर करो इसे!”
लाउंज का दरवाजा खुला और चार पुलिस वाले लाठियां लेकर भीतर घुस आए। उन्होंने मोंटू के हाथ से मोबाइल छीनने की कोशिश की, लेकिन मोंटू ने फुर्ती दिखाते हुए चिल्लाया, “वीडियो अपलोड हो चुका है साले! अब डिलीट करके भी क्या उखाड़ लोगे!”
पुलिस वालों ने चंदर और मोंटू को कॉलर से पकड़ा और बेरहमी से घसीटते हुए लाउंज से बाहर निकालने लगे। बाहर निकालते वक्त मिश्रा बाबू ने दबी आवाज में कहा, “बड़ा आया था नेता बनने, अब जेल की चक्की पीसना।”
लेकिन चंदर हंस रहा था। उसकी पीठ पर पुलिस की लाठी पड़ी, पर उसे दर्द नहीं हुआ। उसे लग रहा था कि आज पहली बार उसकी ‘डिग्री’ ने सिस्टम के उस अभेद्य किले की दीवार में एक बहुत बड़ा छेद कर दिया है।
अध्याय 5: कंफ्यूज युवा का ‘रेज़ोल्यूशन’
फेसबुक लाइव, हवालात की हवा और सिस्टम का नया ‘अपडेट’
पुलिस वैन का पिछला दरवाजा जब लोहे की भारी आवाज के साथ बंद हुआ, तो अंदर पूरी तरह अंधेरा था। चंदर और मोंटू कलेक्ट्रेट के पीछे वाले थाने की तरफ बढ़ रहे थे। मोंटू के गाल पर पुलिस के थप्पड़ का लाल निशान उभर आया था, और चंदर की शर्ट का ऊपर का बटन टूट चुका था।
“कहा था ना भाई,” मोंटू ने वैन के लोहे के सरियों को पकड़ते हुए कहा, उसकी आवाज में थोड़ा डर और थोड़ा रोना था। “विपणन (Marketing) की थ्योरी धरी की धरी रह गई। अब पुलिस वाले हमारी ‘कुटाई का लाइव’ करेंगे।”
चंदर ने अपनी फटी हुई आस्तीन से माथे का पसीना पोंछा और मुस्कुराया। वह हँसी थकावट की नहीं, एक अजीब से सुकून की थी। “मोंटू, तूने वीडियो का एंड देखा था? जब पुलिस वाले हमें घसीट रहे थे, तब लाइव व्यूअर्स की संख्या कितनी थी?”
“मैंने जब आखिरी बार स्क्रीन देखी, तो पच्चीस हजार लोग लाइव थे और कमेंट्स इतनी तेजी से भाग रहे थे कि फोन हैंग होने लगा था,” मोंटू ने बताया।
“बस, तो फिर डर मत। अब जो होगा, वो ये सिस्टम झेलेगा, हम नहीं।”
थाने के भीतर का माहौल कलेक्ट्रेट जैसा ही था, बस यहाँ फाइलों की जगह लाठियाँ रखी थीं। थानेदार साहब, जिनकी नेमप्लेट पर ‘सिंह’ लिखा था, मंत्री जी के केबिन में हुए ड्रामे से बेहद गुस्से में थे। उन्होंने आते ही चंदर और मोंटू को हवालात की सलाखों के पीछे धकेल दिया।
“बड़े आए देश के रक्षक!” थानेदार ने अपनी लाठी मेज पर पटकते हुए कहा। “मंत्री जी की सभा में दंगा करते हो? सरकारी काम में बाधा डालते हो? ऐसी धाराएं लगाऊँगा कि कोर्ट के चक्कर काटते-काटते बुढ़ापा आ जाएगा।”
चंदर सलाखों के पास आया, “साहब, सवाल पूछना दंगा कब से हो गया? हमने कोई पत्थर नहीं उठाया, सिर्फ एक कैमरा उठाया था।”
“चुप रह! कानून मुझे मत सिखा,” थानेदार चिल्लाया।
लेकिन अगले दो घंटे में थाने का नजारा बदलने लगा। थाने के लैंडलाइन फोन की घंटी लगातार बजने लगी। पहले कलेक्ट्रेट के पीआरओ (PRO) का फोन आया, फिर जिले के कप्तान (SP) का। मोंटू ने जो वीडियो लाइव किया था, वह व्हाट्सएप, ट्विटर और फेसबुक पर जंगल की आग की तरह फैल चुका था।
#DegreeVsBabu और #PensionKeLiyeRishwat सोशल मीडिया पर नेशनल ट्रेंड बन चुके थे। शहर के तमाम कोचिंग संस्थानों के छात्र, लाइब्रेरी में पढ़ने वाले युवा और आम नागरिक कलेक्ट्रेट के बाहर इकट्ठा होने शुरू हो गए थे।
शाम के पांच बजते-बजते थाने के बाहर ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘भ्रष्ट अफसरशाही मुर्दाबाद’ के नारे गूंजने लगे। कलेक्ट्रेट के बाहर करीब पांच हजार युवाओं की भीड़ जमा हो चुकी थी, जो चंदर और मोंटू की बिना शर्त रिहाई की मांग कर रही थी।
थानेदार साहब के माथे पर अब पसीना था। वे बार-बार अपने ऊपर के अधिकारियों को फोन लगा रहे थे, “सर, बाहर भीड़ बढ़ती जा रही है। अगर लाठीचार्ज किया, तो मामला और बिगड़ जाएगा। मीडिया वाले भी कैमरे लेकर गेट पर खड़े हैं।”
रात के आठ बजे हवालात का दरवाजा खुला। लेकिन इस बार थानेदार के हाथ में लाठी नहीं, बल्कि चाय के दो कुल्हड़ थे। उनके चेहरे पर एक बनावटी, कूटनीतिक मुस्कान थी।
“आओ चंदर बाबू, बाहर आओ। अरे मोंटू जी, आप भी आइए। वह तो बस थोड़ी गलतफहमी हो गई थी। आप लोग तो देश का भविष्य हैं,” थानेदार ने बड़े प्यार से कहा।
चंदर बाहर निकला। उसने देखा कि थाने के भीतर खुद कलेक्टर श्री 420 प्रसाद और उनके ठीक पीछे भीगे बिल्ली बने मिश्रा बाबू खड़े थे। मिश्रा बाबू के हाथ में एक सरकारी लिफाफा था।
कलेक्ट्रेट के बड़े साहब (कलेटर) ने चंदर के पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखा, “चंदर, आई एम प्राउड ऑफ यू। तुमने हमारी आँखें खोल दीं। हमें नहीं पता था कि नीचे के स्तर पर इतनी घूसखोरी चल रही है।” (यह वही साहब थे जो सुबह चंदर को ‘सिस्टम की चेन’ समझा रहे थे)।
कलेक्टर ने मिश्रा बाबू को आगे धक्का दिया। मिश्रा बाबू ने कांपते हाथों से वह लिफाफा चंदर को थमाया।
“यह क्या है सर?” चंदर ने पूछा।
“यह तुम्हारे बाबूजी की डिजिटल वेरीफाइड पेंशन की मंजूरी का पत्र है,” कलेक्टर ने कहा। “और सिर्फ यही नहीं, मिश्रा जी को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड (Suspended) कर दिया गया है। उनके खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं।”
मोंटू ने चंदर की तरफ देखा, उसकी आँखें खुशी से फैल गई थीं। लेकिन चंदर का चेहरा गंभीर रहा। उसने लिफाफा लिया और मिश्रा बाबू की तरफ देखा, जो जमीन की तरफ ताक रहे थे।
“और सर, उस पेपर लीक का क्या हुआ जो परसों हुआ था?” चंदर ने सीधे कलेक्टर की आँखों में झांका।
कलेक्टर ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा, “सरकार ने राजस्व सहायक की परीक्षा को पूरी तरह रद्द (Cancel) कर दिया है। अगले तीन महीने के भीतर पूरी पारदर्शिता के साथ दोबारा परीक्षा कराई जाएगी। इसके लिए एक नई ऑनलाइन निगरानी प्रणाली बनाई जा रही है।”
जब चंदर और मोंटू थाने के मुख्य गेट से बाहर निकले, तो कलेक्ट्रेट का मैदान मोबाइल की फ्लैशलाइट्स से जगमगा रहा था। हजारों युवाओं ने तालियों और नारों के साथ उनका स्वागत किया। चंदर को कंधे पर उठा लिया गया। जो युवा सुबह तक एक ‘कंफ्यूज्ड बेरोजगार’ था, आज वह उस पूरे शहर के युवाओं की आवाज बन चुका था।
रात के दस बजे चंदर जब अपने घर पहुंचा, तो घर की बत्ती जल रही थी। दरवाजा मां ने खोला। मां ने बिना कुछ बोले उसे गले से लगा लिया। उनकी आँखों में आंसू थे, पर ये डर के नहीं, गर्व के आंसू थे।
पिताजी लिविंग रूम के सोफे पर बैठे थे। उनके हाथ में हमेशा की तरह अखबार नहीं था, बल्कि वे टीवी पर चल रही न्यूज़ देख रहे थे, जिसमें चंदर का वही वीडियो बार-बार दिखाया जा रहा था और नीचे टिकर चल रहा था—‘बेरोजगार युवा ने हिलाया सरकारी तंत्र, बाबू सस्पेंड।’
चंदर आगे बढ़ा और बाबूजी के हाथों में वह पेंशन का लिफाफा थमा दिया। “बाबूजी, आपकी पेंशन का कागज। अब आपको कलेक्ट्रेट की सीढ़ियां नहीं चढ़नी पड़ेंगी।”
बाबूजी ने उस लिफाफे को देखा, फिर चंदर की फटी हुई शर्ट और उसके चेहरे की धूल को देखा। उन्होंने चश्मा उतारा और उसे अपनी धोती से पोंछते हुए कहा, “आज शर्मा जी के लड़के का फोन आया था बेंगलुरु से।”
चंदर का दिल थोड़ा बैठा, उसे लगा फिर वही तुलना शुरू होगी।
लेकिन बाबूजी ने आगे कहा, “वह कह रहा था कि उसने तुम्हारा वीडियो देखा। बोल रहा था कि जो काम पूरे देश के पढ़े-लिखे लोग नहीं कर पाते, वो तुम्हारे चंदर ने अकेले कर दिया। उसने कहा कि चंदर जैसा जिगरा बारह लाख के पैकेज वालों के पास भी नहीं होता।”
बाबूजी उठे, चंदर के पास आए और उसके मजबूत कंधे पर अपना बूढ़ा हाथ रखा। “मुझे माफ़ कर देना बेटा। मैं तुम्हारी डिग्रियों की कीमत सिर्फ रुपयों में आंक रहा था। पर आज तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारी शिक्षा बेकार नहीं गई। तुमने एक बाप को दोबारा जिंदा कर दिया।”
चंदर की आँखों से एक आंसू टपक कर उस सरकारी लिफाफे पर गिर गया। उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा कंफ्यूजन आज हमेशा के लिए खत्म हो चुका था। उसे समझ आ गया था कि नौकरी मिलना या ना मिलना बाजार के हाथ में हो सकता है, लेकिन अपने हक के लिए इस घूसखोर सिस्टम की आँखों में आँखें डालकर सवाल पूछना—यही एक युवा की सबसे बड़ी डिग्री है।
व्यंग्य काव्य (आखिरी पंक्तियाँ) – उपसंहार
बिना नोट के फाइल अब कुछ तो सरकेगी, भ्रष्ट बाबुओं की छाती अब थोड़ा तो धड़केगी। युवा का कंफ्यूजन अब संकल्प बन चुका है, कुर्सी के अहंकार का अब अंत आ चुका है।
ना डिग्री बेकार है, ना मेहनत की हार है, जब जाग उठे युवा, तो झुकती सरकार है। यह कहानी खत्म हुई, पर जंग अभी जारी है, अब इस भ्रष्ट सिस्टम को बदलने की हमारी बारी है।
॥ समाप्त ॥














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